तमिलनाडु में पालतू डॉग की गोद भराई का भव्य आयोजन, फोटोज देख लोग हैरान

देश की सबसे बड़ी ड्रग खेप पकड़ने वाले एसआइ नरेंद्र तिवारी का क्राइम ब्रांच से इस्तीफा चर्चा में है। हालांकि तिवारी इसके पहले भी कोरे कागज पर साइन कर थाना प्रभारियों को इस्तीफा लिखने का अनुरोध कर चुके हैं। आर्मी से पुलिस विभाग में आए तिवारी ही 70 करोड़ रुपये कीमती ड्रग एमडीएमए पकड़ने के मुख्य सूत्रधार हैं। अबू सलेम और दाऊद इब्राहिम गैंग के सदस्यों से तार जोड़ने में भी तिवारी की अहम भूमिका थी।

धरपकड़ के बीच अचानक इस्तीफा देना, किसी के गले नहीं उतरा। सूत्रों का दावा है कि इस्तीफा एमडीएमए केस की विवेचना में आए कुछ अहम बिंदुओं को लेकर दिया था। हालांकि अफसरों ने मामला दबा दिया और तिवारी को भी मना लिया। बात उजागर होने पर कहा तिवारी की निजी समस्याएं थीं। माता-पिता गंभीर बीमारी से ग्रस्त हैं। उनकी देखभाल और उपचार के लिए इस्तीफा लिखा था।

गरबा कांड में फंस गए पुलिसवाले

द्वारकापुरी थाना पुलिस गरबा केस को लेकर खूब सुर्खियां बटोर रही है। बताया जा रहा है कि गरबा रुकवाकर खुशी से झूम रहे पुलिसवाले अब खुद को ही कोस रहे हैं। ऐसा नहीं है कि बगैर अनुमति चल रहे गरबा की पुलिस को जानकारी नहीं थी। बल्कि पुलिस तो पहले ही रसीद फाड़ चुकी थी। लेकिन भीड़ उमड़ गई और अफसरों की दखलअंदाजी के बाद डंडे फटकारने पड़ गए।

यहां से शुभ- लाभ का रास्ता मिल गया और आयोजक व संचालक ने जेब गरम कर दी। थोड़ी देर बाद यह बात भी आला अफसरों के कानों तक जा पहुंची और पुलिस जवानों को बगैर लाग लपेट के माल लौटाना पड़ गया। हाथ मसल रहे पुलिसवाले अब एक दूसरे को नुकसान का दोषी बता रहे हैं। विवाद के बीच एक पुलिसवाले ने तो यह भी बता दिया कि साहब को भी शामिल कर लिया होता तो न रिटर्न की नौबत आती न ही केस बनाना पड़ता।

नकली डीजल से चल रही थी अफसरों की गाड़ियां

मिलावटखोरों को पकड़ने वाली पुलिस खुद ठगी का शिकार हो गई। मिलावट माफिया सालों से नकली डीजल भरता रहा और पुलिसवालों को भनक तक नहीं लगी। जब पकड़ने पहुंचे तो अफसरों ने जवानों को रोकने में दमखम भी लगा दिया। उमरिया में जिस पेट्रोल पंप पर किशनगंज थाना पुलिस ने छापा मारा वो पीथमपुर से नकली पेट्रोल-डीजल खरीदता था।

ग्रामीण थानों की जीप, टीआइ एसडीओपी की गाड़ियों में भी यहीं से डीजल भरा जाता था। एसपी (पश्चिम) महेशचंद जैन को जब इसकी भनक लगी तो छापा डलवा दिया। लेकिन अचानक अफसरों को संदेश आया कि कार्रवाई से पुलिस की बदनामी हो जाएगी। हालांकि तब तक हाथ से बात निकल चुकी थी। इस घटना के बाद अफसर इस बात की तह तक जाने में जुट गए हैं कि क्या सरकारी गाड़ी चलाने वाले ड्राइवर या पुलिसकर्मी भी मिलावट माफिया से मिले हुए थे।

एसआइटी के बहाने जांच दबा रहे अफसर

फर्जी फैसला कांड अचानक ठंडे बस्ते में क्यों चला गया, इसका किसी के पास जबाव नहीं है। रातोंरात जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम (एसआइटी) बनाने के बाद भी जांच जस की तस ही पड़ी है। कोतवाली क्षेत्र के सीएसपी हरीश मोटवानी ने तो संदेही जजों की कुंडली बनाकर गिरफ्तारी की तैयारी भी कर ली थी। वाट्सएप मैसेज, आइएएस संतोष वर्मा के बयान, काल रिकार्डिंग और काल डिटेल भेजकर हाई कोर्ट से अनुमति भी ले ली। लेकिन अचानक सीएसपी को जांच से हटाकर डीएसपी अनिल सिंह चौहान को डायरी सौंप दी।

इसके बाद एसआइटी का गठन किया और यह भी दावा किया कि जजों को गिरफ्तार करना ही शेष है। बैठक-नोटिस की बातें हुईं, लेकिन सवा महीने बीतने के बाद भी फाइल जस की तस पड़ी हुई है। बताया जाता है गिरफ्तारी की रूपरेखा बना चुकी एसआइटी को मुख्यालय से मिले संदेश के बाद जांच दबानी है।